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Wednesday, 14 August 2019

साधन पंचकम् (शंकराचार्य)

वेदो नित्यमधीयताम्,
तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां,
तेनेशस्य विधीयताम-
पचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम्।
पापौघः परिधूयतां
भवसुखे दोषोsनुसंधीयतां,
आत्मेच्छा व्यवसीयतां
निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्॥१॥
वेदों का नियमितअध्ययन करें, उनमें निर्देशित (कहे गए) कर्मों का पालन करें, उस परम प्रभु के विधानों (नियमों)  का पालन करें, व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें। समग्र पापों  को जला दें, इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें, आत्म-ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें, अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें ॥१॥
संगः सत्सु विधीयतां
भगवतो भक्ति: दृढाऽऽधीयतां,
शान्त्यादिः परिचीयतां
दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम्। 
सद्विद्वानुपसृप्यतां प्रतिदिनं
तत्पादुका सेव्यतां,
ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां
श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्॥२॥
सज्जनों का साथ करें, प्रभु में भक्ति को दृढ़ करें, शांति आदि गुणों का सेवन करें, कठोर कर्मों का परित्याग करें, सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें, प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें, ब्रह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें, उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें ॥२॥
वाक्यार्थश्च विचार्यतां
श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयतां,
दुस्तर्कात् सुविरम्यतां
श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसंधीयताम्। 
ब्रम्हास्मीति विभाव्यता-
महरहर्गर्वः परित्यज्यताम् 
देहेऽहंमति रुझ्यतां
बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम्॥३॥  
वाक्यों के अर्थ पर विचार करें, श्रुति के प्रधान पक्ष का अनुसरण करें, कुतर्कों से दूर रहें, श्रुति पक्ष के तर्कों का विश्लेषण करें, मैं ब्रह्म हूँ ऐसा विचार करते हुए मैं रुपी अभिमान का त्याग करें, मैं शरीर हूँ, इस भाव का त्याग करें, बुद्धिमानों से वाद-विवाद न करें ॥३॥
क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां
प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां,
स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां
विधिवशात् प्राप्तेनसंतुष्यताम्। 
शीतोष्णादि विषह्यतां
न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां औदासीन्यमभीप्स्यतां
जनकृपानैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम्॥४॥
भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें, स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें, भाग्यवश जो भी प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहें| सर्दी-गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें, व्यर्थ वाक्य न बोलें, निरपेक्षता की इच्छा करें, लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें ॥४॥
एकान्ते सुखमास्यतां
परतरे चेतः समाधीयतां
पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां
जगदिदं तद्वाधितं दृश्यताम्।
प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां
चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिश्यतां
प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ
परब्रह्मात्मना स्थीयताम्॥५॥ 
एकांत के सुख का सेवन करें,  परब्रह्म में चित्त को लगायें, परब्रह्म की खोज करें, इस विश्व को उससे व्याप्त देखें, पूर्व कर्मों का नाश करें, मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें, प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परब्रह्म में स्थित हो जाएँ ॥५॥

Thursday, 25 April 2019

श्री शिक्षाष्टकम् (चैतन्य महाप्रभु)


श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो जो हृदय में वर्षों से संचित मल का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी दावानल को शांत करने वाला है । यह संकीर्तन यज्ञ मानवता के लिए परम कल्याणकारी है क्योंकि चन्द्र-किरणों की तरह शीतलता प्रदान करता है। समस्त अप्राकृत विद्या रूपी वधु का यही जीवन है । यह आनंद के सागर की वृद्धि करने वाला है और नित्य अमृत का आस्वादन कराने वाला है ॥१॥

हे भगवन ! आपका मात्र नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है-कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन नामों में अपनी समस्त अप्राकृत शक्तियां अर्पित कर दी हैं । इन नामों का स्मरण एवं कीर्तन करने में देश-काल आदि का कोई भी नियम नहीं है । प्रभु ! आपने  अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए ॥३॥

हे सर्व समर्थ जगदीश ! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, सुन्दर स्त्री अथवा प्रशंनीय काव्यों का इक्छुक नहीं हूँ । मेरी तो एकमात्र यही कामना है कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपकी अहैतुकी भक्ति कर सकूँ  ॥४॥

हे नन्दतनुज ! मैं आपका नित्य दास हूँ किन्तु किसी कारणवश मैं जन्म-मृत्यु रूपी इस सागर में गिर पड़ा हूँ । कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि बनाकर मुझे इस विषम मृत्युसागर से मुक्त करिये ॥५॥

हे प्रभु ! आपका नाम कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद्गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ॥६॥ 

हे गोविन्द ! आपके विरह में मुझे एक क्षण भी एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है । नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है तथा समस्त जगत एक शून्य के समान दिख रहा है ॥७॥

एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं ॥८॥

निर्वाण षट्कम (शंकराचार्य)

मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् 
न च श्रोत्र जिह्वे न चघ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: 
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥1॥

मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: 
न वा सप्तधातुर्न वापञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू 
चिदानन्दरूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥2॥

मैं न प्राण हूं,  न ही पंच वायु हूं
मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्‍सर्जन की इन्द्रियां हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो 
नैव मे नैव मात्सर्यभाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: 
चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥3॥

न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है,
और न मोह, न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् 
न मन्त्रो न तीर्थं नवेदार् न यज्ञा:
नहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्दरूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥4॥

मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ, न मैं भोजन(भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता नजन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: 
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥5॥

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ 
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: 
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥

मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं
मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं,
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं।


Tuesday, 20 October 2015

शक्तिदायी विचार (स्वामी विवेकानंद)


उठो, जागो और सोओ मत। सारे अभाव और दु:ख नष्ट करने की शक्ति तुम्हीं में है, इस बात पर विश्वास करने ही से वह शक्ति जाग उठेगी। ... मनुष्य तब अपनी उस आत्मा की महिमा में प्रतिष्ठित हो जाता है, जो असीम अनन्त है, अविनाशी है, जिसे कोई शस्त्र छेद नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती, – जो असीम है, जन्म-मृत्यु रहित है तथा जिसकी महत्ता के सामने सूर्यचन्द्रादि, यहाँ तक कि सारा ब्रह्माण्ड सिन्धु में बिन्दु तुल्य प्रतीत होता है – जिसकी महत्ता के सामने देश और काल का भी अस्तित्व लुप्त हो जाता है।दिन-रात श्रवण करो कि तुम्हीं वह आत्मा हो।
दिन-रात यही भाव अपने में व्याप्त किये रहो, यहाँ तक कि वह तुम्हारे रक्त के प्रत्येक बूँद में और तुम्हारी नस नस में समा जाय। सम्पूर्ण शरीर को इसी एक आदर्श के भाव से पूर्ण कर दो – ‘मैं अज, अविनाशी, आनन्दमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान नित्य ज्योतिर्मय आत्मा हूँ’ – दिन-रात यही चिन्तन करते रहो, जब तक कि यह भाव तुम्हारे जीवन का अविच्छेद्य अगं नहीं बन जाता। इसीका ध्यान करते रहो – और इसीसे तुम कर्म करने में समर्थ हो सकोगे। ... तब इस विचार-शक्ति के प्रभाव से तुम्हारे सम्पूर्ण कर्म बृहत्, परिवर्तित और देवभावापन्न हो जायेंगे। अगर ‘जड़’ शक्तिशाली है, तो ‘विचार’ सर्वशक्तिमान है। इस विचार से अपने जीवन को प्रेरित कर डालो, स्वयं को अपनी तेजस्विता, सर्वशक्तिमत्ता और गरिमा के भाव से पूर्णत: भर लो। तूम वीर्यवान, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो। तुम्हारे भीतर सम्पूर्ण ज्ञान, सारी शक्तियाँ, पूर्ण पवित्रता और स्वाधीनता के भाव विद्यमान हैं।
Swami Vivekananda

( Posted from "Voice of Vivekananda" Android App )