रामकृष्ण परमहंस
( 17/02/1836 - 15/08/1886)
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* ध्यान करते समय ईश्वर में डूब जाना चाहिए , ऊपर तैरने से क्या पानी के नीचे बाले लाल मिल सकते हैं ?
* कछुआ रहता तो पानी में है , पर उसका मन रहता है किनारे पर , जहाँ उसके अंडे रखे रहते हैं । संसार का काम करो पर मन रखो ईश्वर में ।
* हाथों में तेल लगाकर कटहल काटना चाहिये । अन्यथा हाथों में उसका दूध चिपक जाता है । भगवद्भक्ति रुपी तेल हाथों में लगाकर संसार रुपी कटहल के लिये हाथ बढ़ाओ ।
* दुष्टों के प्रति फुफकारना चाहिये , भय दिखाना चाहिये । जिससे वे कोई अनिष्ट न कर बैठें । पर उनका अनिष्ट न करना चाहिये ।
* कभी-कभी साधुओं का संग करना चाहिये और कभी-कभी निर्जन स्थान में ईश्वर का स्मरण और विचार ।
* जो बिषय का त्याग नहीं कर सकते , जिनका अहं भाव किसी तरह जाता नहीं , उनके लिये ‘ मैं दास हूँ ‘ ‘ मैं भक्त हूँ ‘ यह अभिमान अच्छा है । परन्तु ‘ मैं ब्रह्म हूँ ‘ ऐंसा अभिमान ठीक नहीं ।
* तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं । नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर । नीचे की सुई और ऊपर की सुई का एक होना ही योग है ।
* जो मनुष्य सर्बदा ईश्वर चिंतन करता है वही जान सकता है कि उनका स्वरुप क्या है ? दूसरे लोग केवल बाद-बिवाद करके कष्ट उठाते हैं ।
* सत्यवादिता कलियुग का तप है ।
* भक्ति भगवान को उतनी प्रिय है जितनी बैल को सानी।
* जिन्हे चैतन्य हुआ है , वे पाप-पुण्य के पार चले गये हैं । वे देखते हैं , ईश्वर ही सब कुछ कर रहा है ।
* हे ईश्वर तुम कर्ता हो और मैं अकर्ता हूँ । इसी का नाम ज्ञान है ।
* आम पर छिलका है इसलिये आम बढ़ता और पकता है । आम जब तैयार हो जाता है उस समय छिलका फेंक देना पड़ता है । इसी प्रकार माया रुपी छिलका रहने पर ही धीरे-धीरे ब्रह्मज्ञान होता है ।
* बिद्या से एक लाभ होता है । उससे यह मालूम हो जाता है कि मैं कुछ नहीं जानता और मैं कुछ नहीं हूँ ।
* वेदांती सदैब विचार करते हैं – ब्रह्म सत्य है , जगत मिथ्या है । यदि जगत मिथ्या है तो जो कह रहे हैं वे भी मिथ्या हैं । उनकी वातें भी स्वप्नवत हैं । बड़े दूर की बात है ।
* दया अर्थात सब प्राणियों से समान प्रेम ।
* जहाँ ब्रह्मज्ञान है वहाँ से सतोगुण भी बहुत दूर है ।
* ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं । जो ब्रह्म हैं वे ही शक्ति हैं ।
* प्रायः उद्यान के बर्णन से ही चर्चा प्रारंभ और उसी में समाप्त हो जाती है । उद्यान के मालिक की खोज नहीं की जाती । जबकि ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है ।
* कंस के कारागार में देवकी-बासुदेव को चतुर्भुज शंख-चक्र-पद्म-गदा धारी भगवान के दर्शन हुए । पर तो भी उनका कारावास नहीं छूटा । शरीर ही सारे अनर्थ का मूल है , उसी को छूट जाना चाहिए था ।
प्रारब्ध कर्मों का भोग होता ही है । जो बाण एक बार छोड़ा जा चुका , उस पर फिर किसी तरह का वश नहीं चलता ।
प्रारब्ध कर्मों का भोग होता ही है । जो बाण एक बार छोड़ा जा चुका , उस पर फिर किसी तरह का वश नहीं चलता ।
* जिस चालाकी से लोग ईश्वर को पाते हैं , वही चालाकी चालाकी है – सा चातुरी चातुरी ।
* ब्रह्मज्ञान के बाद भी अवस्था है । ज्ञान के बाद बिज्ञान है । बिज्ञान का अर्थ उन्हे बिशेष रूप से जानना है ।
* लकड़ी में आग है , इस बोध , इस विश्वास का नाम है ज्ञान । और उस आग से खाना बनाना , खाना खाकर हृष्ट-पुष्ट होना इसका नाम है बिज्ञान ।
ईश्वर है , हृदय में यह बोध होना ज्ञान है । उनके साथ बार्तालाप करना , उनके साथ दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर आदि भावों से आनंद करना बिज्ञान है ।
ईश्वर है , हृदय में यह बोध होना ज्ञान है । उनके साथ बार्तालाप करना , उनके साथ दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर आदि भावों से आनंद करना बिज्ञान है ।
* ईश्वर के नाम से मनुष्य पवित्र होता है । इसलिए नाम संकीर्तन का अभ्यास करना चाहिये ।
* यदि अभ्यास रहा तो अंतिम समय उन्ही का नाम मुह से निकलेगा ।
* पाश में जो बंधा हुआ है वह जीव है और उससे जो मुक्त है वह शिव है ।
* देह बनी भी है और बिगड़ भी जायेगी पर आत्मा अमर है ।
* जैंसा रोग होता वैसी ही उसकी दवा दी जाती है । गीता में उन्होंने कहा है- मामेकं शरणं व्रज । उनकी जो इच्छा है वह करें । वे इच्छामय हैं । मनुष्य की क्या शक्ति है ?
* बिषयी मनुष्यों की कभी-कभी समाधि की अवस्था हो सकती है । सूर्योदय होने पर कमल खिल जाता है । परन्तु सूर्य मेघों से ढक जाने पर फिर बंद हो जाता है । विषय मेघ हैं ।
* श्री गुरु की कृपा से सब ग्रंथियाँ एक क्षण में ही खुल जाती हैं ।
* एकादशी करना अच्छा है । इससे मन पवित्र होता है । और ईश्वर पर भक्ति होती है ।
* जिसने संसार को त्याग दिया है , वह बहुत कुछ आगे बढ़ गया है ।
* केवल पंडिताई से क्या होगा , यदि बिवेक बैराग्य न हुआ ?
* ब्रह्म क्या है यह मुख से नहीं कहा जा सकता । वेद-पुराण-तंत्र-षड्दर्शन सब जूठे हो गये हैं ।
* लज्जा , घृणा और भय इन तीनों के रहते ईश्वर नहीं मिलता ।
* शिक्षा देना कठिन काम है । ईश्वर दर्शन के बाद उनका आदेश पाये तो वह लोगों को शिक्षा दे सकता है । परन्तु आदेश मिला है यह केवल मन में सोच लेने से नहीं चलता । ईश्वर सचमुच ही दर्शन देते हैं । और बातचीत करते हैं ।
* जिस पृथ्वी की सूर्य के साथ तुलना करने पर वह एक भटे की तरह जान पड़ती है , बस उतनी ही जगह पर मनुष्य चल-फिर रहा है ।
* जिस प्रकार पढ़ लेने पर पत्र अनुपयोगी हो जाता है , उसी प्रकार शास्त्रों का सार जान लेने पर पुस्तकें पढ़ने की आवश्यकता ।
* पढ़ने तथा अनुभव करने में बहुत अंतर है ।
ईश्वर दर्शन के बाद शास्त्र-विज्ञान आदि कूड़ा कर्कट जैंसे लगते हैं ।
ईश्वर दर्शन के बाद शास्त्र-विज्ञान आदि कूड़ा कर्कट जैंसे लगते हैं ।
* प्रेम परीक्षा नहीं करता बिश्वास करता है ।
* जिसे जो देना है यह उनका पहले से ही ठीक किया हुआ है । समय हुए बिना कुछ नहीं होता ।
* मन से कंचन और कामिनी का त्याग हुए बिना सारे त्याग बकवास हैं ।
* देह का सुख-दुःख चाहे कुछ भी हो , भक्त का ज्ञान भक्ति का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होता ।
* साधना करते-करते ही उनकी कृपा से लोग सिद्ध होते हैं । कुछ परिश्रम भी करना पड़ता है । इसके बाद दर्शन और आनंद ।
* विचार जहाँ पहुंचकर रुक जाते हैं वहीं ब्रह्म हैं ।
* उन्हे जानकर संसार में रहने से संसार अनित्य नहीं रहता ।
* जिस विद्या के पाने पर मनुष्य उन्हे पा सकता है , वही यथार्थ विद्या है ।


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